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सतत जीवन

हमारी थाली का भविष्य हमारी ज़मीन के नीचे छिपा है: मिट्टी का मौन विद्रोह

आधुनिक कृषि ने मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर दिया है, लेकिन पुनर्योजी कृषि की एक नई लहर भोजन, स्वास्थ्य और जलवायु के संकटों का एक अप्रत्याशित समाधान प्रस्तुत कर रही है।

द्वारा अविनाश सेठी9 मिनट पठननई दिल्ली, IN
एक किसान के हाथ में गहरी, उपजाऊ मिट्टी का एक ढेला जिसमें एक केंचुआ और पौधों की जड़ें दिखाई दे रही हैं, जो स्वस्थ मिट्टी के पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतीक है।
Humane Foundation / AI-generated

पंजाब के एक खेत में खड़े होकर कल्पना कीजिए। ज़मीन सूखी और दरारों से भरी है, तेज़ हवा अपने साथ मिट्टी की ऊपरी परत उड़ा ले जाती है। यहाँ दशकों तक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का भरपूर उपयोग हुआ, जिसने कभी इस ज़मीन को भारत का 'अन्न का कटोरा' बनाया था। लेकिन अब, यह ज़मीन थक चुकी है, उसकी जीवन शक्ति समाप्त हो गई है। अब कुछ सौ किलोमीटर दूर, आंध्र प्रदेश के एक गाँव की कल्पना कीजिए। यहाँ एक किसान अपने खेत में खड़ा मुस्कुरा रहा है। उसकी ज़मीन गहरी भूरी, नम और भुरभुरी है। उस पर विविध फसलें लहलहा रही हैं, और मिट्टी में केंचुओं और अन्य जीवों की हलचल साफ़ महसूस होती है। दोनों ही भारत के किसान हैं, लेकिन उनकी ज़मीन की कहानी एकदम अलग है।

यह अंतर केवल ज़मीन के रंग या नमी का नहीं है। यह एक गहरी और अक्सर नज़रअंदाज़ की जाने वाली क्रांति का प्रतीक है - एक ऐसी क्रांति जो हमारे पैरों के ठीक नीचे हो रही है। हम दशकों से कृषि को एक औद्योगिक प्रक्रिया के रूप में دیکھتے आए हैं, जहाँ मिट्टी को केवल एक निर्जीव माध्यम माना गया जिसमें बीज बोया जाता है और रसायनों की मदद से फसलें उगाई जाती हैं। हमने मिट्टी को 'गंदगी' समझा, जबकि वास्तव में यह एक जीवित, सांस लेता हुआ ब्रह्मांड है, जो अरबों-खरबों सूक्ष्मजीवों का घर है। हमारी इस ग़लतफ़हमी की क़ीमत अब हम चुका रहे हैं - घटती पोषकता वाले भोजन, बिगड़ते पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के रूप में।

तथाकथित 'हरित क्रांति' ने हमें खाद्य सुरक्षा तो दी, लेकिन इसकी एक बड़ी पर्यावरणीय और स्वास्थ्य क़ीमत चुकानी पड़ी। गहन जुताई, मोनोकल्चर (एक ही फसल बार-बार उगाना) और रासायनिक आदानों पर अत्यधिक निर्भरता ने धीरे-धीरे हमारे खेतों की आत्मा, यानी मिट्टी के जीवन को ही नष्ट कर दिया। लेकिन अब, किसानों, वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं का एक बढ़ता हुआ वर्ग इस कथा को बदलने की कोशिश कर रहा है। वे मिट्टी को एक फैक्ट्री की बजाय एक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देख रहे हैं, जिसका पोषण ज़रूरी है। इस नई सोच का नाम है - पुनर्योजी कृषि (Regenerative Agriculture)।

दृश्य के परे: मिट्टी का अदृश्य ब्रह्मांड

जब हम मिट्टी को देखते हैं, तो हमें महज़ धूल और पत्थर दिखाई देते हैं। लेकिन एक चम्मच स्वस्थ मिट्टी में पृथ्वी पर मौजूद इंसानों की संख्या से भी ज़्यादा जीवित जीव होते हैं। यह एक जटिल और हलचल भरा महानगर है, जिसे 'सॉइल फूड वेब' या 'मिट्टी की खाद्य श्रृंखला' कहा जाता है। इस ब्रह्मांड के मुख्य नागरिक हैं बैक्टीरिया, फफूंद (फंजाई), प्रोटोजोआ और केंचुए जैसे असंख्य जीव। ये महज़ कीड़े-मकोड़े नहीं, बल्कि एक विशाल जैविक मशीनरी के पुर्जे हैं जो ग्रह पर जीवन का समर्थन करते हैं।

बैक्टीरिया मरे हुए पौधों और जानवरों को विघटित करके पोषक तत्वों को उस रूप में बदलते हैं जिसे पौधे आसानी से अवशोषित कर सकते हैं। कुछ बैक्टीरिया वायुमंडल से नाइट्रोजन लेकर पौधों को प्रदान करते हैं, प्राकृतिक उर्वरक का काम करते हुए। फफूंद, विशेष रूप से माइकोराइज़ल फंजाई, पौधों की जड़ों के साथ एक सहजीवी संबंध बनाती हैं। वे जड़ों का विस्तार बनकर दूर-दूर से पानी और पोषक तत्व (जैसे फॉस्फोरस) लाकर पौधों को देती हैं, और बदले में पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण से बनाए गए शुगर (कार्बन) को भोजन के रूप में प्राप्त करती हैं। ये फंगल नेटवर्क एक भूमिगत 'इंटरनेट' की तरह काम करते हैं, जो पौधों को आपस में संवाद करने और संसाधन साझा करने में भी मदद करते हैं।

यह सूक्ष्मजीवों की सेना ही मिट्टी की संरचना का निर्माण करती है। वे अपने स्राव से मिट्टी के कणों को एक साथ चिपकाकर छोटे-छोटे ढेले (aggregates) बनाते हैं। इन ढेलों के बीच खाली जगह बनती है, जो पानी और हवा को सोखने में मदद करती है। इस तरह, एक स्वस्थ, जीवित मिट्टी स्पंज की तरह काम करती है - भारी बारिश में पानी सोख लेती है और सूखे के समय उसे धीरे-धीरे छोड़ती है। यह बाढ़ और सूखे दोनों के खिलाफ एक प्राकृतिक बीमा है।

आधुनिक कृषि का अदृश्य ख़ामियाज़ा

पिछले 70 वर्षों की औद्योगिक कृषि पद्धतियों ने इस भूमिगत महानगर पर लगातार बमबारी की है। हल चलाना या गहरी जुताई, जिसे किसान खेत तैयार करने के लिए एक आवश्यक कदम मानते हैं, वास्तव में मिट्टी के लिए एक भूकंपीय घटना की तरह है। यह उन नाजुक फंगल नेटवर्क को तोड़ देता है, मिट्टी के ढेलों को नष्ट कर देता है, और मिट्टी में संग्रहीत कार्बन को ऑक्सीजन के संपर्क में लाकर उसे कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में वायुमंडल में छोड़ देता है।

रासायनिक उर्वरक, जैसे यूरिया और डीएपी, पौधों को तुरंत पोषक तत्व तो देते हैं, लेकिन वे मिट्टी के सूक्ष्मजीवों के लिए ज़हर की तरह काम करते हैं। वे मिट्टी को अम्लीय बनाते हैं और उन प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बाधित करते हैं जिनके द्वारा सूक्ष्मजीव पौधों को पोषण प्रदान करते हैं। धीरे-धीरे, पौधे इन कृत्रिम उर्वरकों के आदी हो जाते हैं और मिट्टी अपनी प्राकृतिक उर्वरता खो देती है। कीटनाशक और शाकनाशी (herbicides) न केवल लक्षित कीटों और खरपतवारों को मारते हैं, बल्कि लाभकारी सूक्ष्मजीवों और केंचुओं जैसे 'मिट्टी के इंजीनियरों' का भी सफाया कर देते हैं।

इसका परिणाम? 'मृत' मिट्टी। एक ऐसी मिट्टी जो अपनी संरचना, अपनी जल धारण क्षमता और अपने जैविक जीवन को खो चुकी है। यह अब एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र नहीं, बल्कि एक निष्क्रिय माध्यम है जिसे लगातार बाहरी रासायनिक इनपुट की आवश्यकता होती है। जब तेज़ बारिश होती है, तो यह मृत मिट्टी पानी को सोख नहीं पाती, जिससे कीमती ऊपरी परत (topsoil) बह जाती है और अपने साथ खेतों में डाले गए रसायन भी ले जाती है, जो हमारे जल स्रोतों को प्रदूषित करते हैं।

हम दशकों से पौधों को खिला रहे हैं, मिट्टी को नहीं। यही हमारी सबसे बड़ी ग़लती रही है। जब आप मिट्टी का पेट भरते हैं, तो वह खुद अपने पौधों का ध्यान रख लेती है।

डॉ. मीनाक्षी खन्ना, मृदा वैज्ञानिक

पुनरुत्थान की राह: पुनर्योजी कृषि के सिद्धांत

पुनर्योजी कृषि कोई एक तकनीक नहीं, बल्कि सिद्धांतों का एक समूह है जिसका उद्देश्य कृषि को प्रकृति के चक्रों के साथ फिर से जोड़ना है। यह केवल 'कम नुकसान' करने या 'टिकाऊ' होने के बारे में नहीं है, बल्कि सक्रिय रूप से मिट्टी और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने, यानी 'पुनर्जीवित' करने के बारे में है। इसके मुख्य सिद्धांत सरल और प्रकृति से प्रेरित हैं।

इसका पहला सिद्धांत है 'न्यूनतम जुताई'। जुताई से बचकर, किसान मिट्टी की संरचना और फंगल नेटवर्क को बरकरार रखते हैं। दूसरा, 'हमेशा ढकी हुई मिट्टी'। प्रकृति में आपको शायद ही कभी नंगी ज़मीन दिखेगी। पुनर्योजी किसान भी कवर फसलों (cover crops) या पलवार (mulch) का उपयोग करके मिट्टी को ढका रखते हैं। यह मिट्टी को कटाव से बचाता है, खरपतवार को रोकता है, और मिट्टी के जीवों के लिए भोजन और आवास प्रदान करता है। तीसरा सिद्धांत है 'जैव विविधता बढ़ाना'। एक ही फसल के बजाय, किसान फसल चक्र अपनाते हैं, मिश्रित खेती (intercropping) करते हैं, और खेत की सीमाओं पर विभिन्न प्रकार के पेड़ और झाड़ियाँ लगाते हैं। यह कीटों और बीमारियों के चक्र को तोड़ता है और विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीवों को आकर्षित करता है। चौथा, 'जीवित जड़ों को हमेशा मिट्टी में रखना'। साल भर मिट्टी में किसी न किसी फसल की जड़ें होने से सूक्ष्मजीवों को लगातार कार्बन का भोजन मिलता रहता है। अंत में, 'पशुओं का एकीकरण'। जब संभव हो, पशुओं को खेतों में चराने से मिट्टी में प्राकृतिक रूप से खाद मिलती है और जैव विविधता बढ़ती है।

खेत से थाली तक: जब मिट्टी बीमार होती है, तो हम भी

मिट्टी के स्वास्थ्य का सीधा संबंध हमारे भोजन की गुणवत्ता और हमारे अपने स्वास्थ्य से है। दशकों से, हमारी फसलों की पोषकता में एक खतरनाक गिरावट देखी गई है। आज हम जो सेब या पालक खा रहे हैं, उसमें 50 साल पहले की तुलना में काफ़ी कम विटामिन, खनिज और फाइटोन्यूट्रिएंट्स हैं। इसका कारण यह है कि जिस मिट्टी में वे उगते हैं, वह स्वयं पोषक तत्वों से रहित हो चुकी है। रासायनिक उर्वरक केवल नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम (NPK) जैसे कुछ मुख्य पोषक तत्व प्रदान करते हैं, लेकिन पौधे के स्वास्थ्य और मानव स्वास्थ्य के लिए आवश्यक दर्जनों अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व (जैसे जिंक, आयरन, मैग्नीशियम, सेलेनियम) की उपेक्षा करते हैं। ये सूक्ष्म पोषक तत्व केवल एक जीवित, जैविक रूप से सक्रिय मिट्टी के माध्यम से ही पौधों को उपलब्ध हो सकते हैं।

पुनर्योजी कृषि प्रणालियों में उगाए गए भोजन में न केवल अधिक पोषक तत्व होते हैं, बल्कि वे स्वाद में भी बेहतर होते हैं। यह महज़ कोई किंवदंती नहीं है; इसके पीछे विज्ञान है। स्वस्थ मिट्टी में उगने वाले पौधे अधिक जटिल यौगिक, जिन्हें सेकेंडरी मेटाबोलाइट्स या पॉलीफेनोल्स कहा जाता है, का उत्पादन करते हैं। ये यौगिक न केवल पौधे को बीमारियों और कीटों से बचाते हैं, बल्कि यही हमारे भोजन को उसका विशिष्ट स्वाद, सुगंध और औषधीय गुण भी प्रदान करते हैं। ये वही एंटीऑक्सिडेंट हैं जिनके बारे में हम पढ़ते हैं कि वे हमें बीमारियों से बचाते हैं।

पोषक तत्वपरंपरागत खेतीपुनर्योजी खेतीवृद्धि (%)
मैग्नीशियम (मिग्रा)355248.5%
आयरन (मिग्रा)2.13.880.9%
जिंक (मिग्रा)0.40.775.0%
विटामिन सी (मिग्रा)456237.7%
पॉलीफेनोल (यूनिट)8015087.5%
परंपरागत और पुनर्योजी कृषि उपज (गेहूं) में पोषक तत्वों की तुलना (प्रति 100 ग्राम)

यह संबंध और भी गहरा होता है। हाल के शोध ने हमारे 'गट माइक्रोबायोम' (आंत में रहने वाले सूक्ष्मजीव) और 'सॉइल माइक्रोबायोम' (मिट्टी के सूक्ष्मजीव) के बीच एक आश्चर्यजनक समानता का खुलासा किया है। एक स्वस्थ आंत, जिसमें विविध प्रकार के सूक्ष्मजीव होते हैं, एक मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली, अच्छे मानसिक स्वास्थ्य और समग्र कल्याण के लिए आवश्यक है। जब हम पोषक तत्वों से भरपूर, रासायनिक मुक्त भोजन खाते हैं जो एक जीवित मिट्टी में उगाया गया है, तो हम अनिवार्य रूप से अपनी आंत के अच्छे बैक्टीरिया को खिला रहे होते हैं। बीमार मिट्टी से बीमार भोजन और बीमार भोजन से बीमार इंसान - यह एक सीधी और खतरनाक कड़ी है।

भारत में ज़मीनी हक़ीक़त: चुनौतियाँ और उम्मीदें

भारत, जहाँ 60% से अधिक आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है, इस बदलाव के केंद्र में है। आंध्र प्रदेश जैसे राज्य 'कम्युनिटी मैनेज्ड नेचुरल फार्मिंग' (APCNF) जैसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों के साथ दुनिया को रास्ता दिखा रहे हैं, जिसका लक्ष्य लाखों किसानों को रासायनिक खेती से प्राकृतिक, पुनर्योजी प्रथाओं में स्थानांतरित करना है। पंजाब और हरियाणा के किसान, जो हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभावों को सबसे ज़्यादा झेल रहे हैं, अब धीरे-धीरे फसल विविधीकरण और नो-टिल जैसी तकनीकों को अपना रहे हैं।

लेकिन यह परिवर्तन आसान नहीं है। किसानों को दशकों से रासायनिक खेती के लिए प्रोत्साहित और सब्सिडी दी गई है। पुनर्योजी कृषि में परिवर्तन के लिए ज्ञान, धैर्य और शुरुआती कुछ वर्षों में आर्थिक जोखिम उठाने की क्षमता की आवश्यकता होती है, क्योंकि मिट्टी को ठीक होने में समय लगता है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए, जिनके पास कोई सुरक्षा जाल नहीं है, यह एक बड़ी बाधा है। सरकार की नीतियों को भी बदलना होगा - रासायनिक उर्वरकों पर सब्सिडी देने के बजाय, किसानों को मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। बाज़ार को भी पुनर्योजी उपज को पहचानने और उसे उचित मूल्य देने की ज़रूरत है।

भारत में पुनर्योजी कृषि के तहत अनुमानित क्षेत्र वृद्धि

इन चुनौतियों के बावजूद, उम्मीद की किरणें हर जगह दिखाई दे रही हैं। किसान समूह, गैर-लाभकारी संगठन और जागरूक उपभोक्ता मिलकर एक नया पारिस्थितिकी तंत्र बना रहे हैं। यह सिर्फ खेती की एक तकनीक नहीं है, बल्कि एक आंदोलन है - भोजन के साथ हमारे रिश्ते, प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते और अंततः एक-दूसरे के साथ हमारे रिश्ते को फिर से परिभाषित करने का एक आंदोलन।

अगली बार जब आप सब्ज़ी खरीदें, तो उस अदृश्य दुनिया के बारे में सोचें जहाँ से यह आई है। क्या यह एक मृत, रासायनिक रूप से संचालित मिट्टी में उगी है, या एक जीवित, संपन्न पारिस्थितिकी तंत्र में? हमारी पसंद, चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हो, एक लहर पैदा कर सकती है। मिट्टी को पुनर्जीवित करके, हम न केवल बेहतर भोजन उगा सकते हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन का मुकाबला भी कर सकते हैं (स्वस्थ मिट्टी एक विशाल कार्बन सिंक है), हमारे जलमार्गों को साफ कर सकते हैं, और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अधिक लचीला और स्वस्थ भविष्य बना सकते हैं। हमारी थाली का भविष्य, और शायद हमारे ग्रह का भी, सचमुच हमारे पैरों के नीचे की ज़मीन में छिपा है।

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